सम्बन्ध हर्ष से निकले ,अकेलेपन से नहीं।
दूसरे के पास बेशक जाओ। दुसरो के पास जाना ही चाहिए। जीवन सम्बंधित होने का नाम है।
पर सम्बन्ध किस आधार पर है ?दुःख के आधार पर ,या सुख के ?हमारे सम्बन्ध दुर्भाग्यपूर्ण बात है की -किस आधार पर है ?
''तू भी दुखी ,मै भी दुखी। तू मेरे कंधे पर सिर रख कर रो ,और मै तेरे कंधे पर सिर रख कर रोता हूँ। ''
हम सब भण्डार है। दुकाने खोल रखी है की आओ ,जितनी बीमारिया चाहिए हमारे पास से ले जाओ और हम बेचने को भी बड़ा उत्सुक है। जिसके पास दुःख है ,वो क्या बेचेगा ?दुःख ही बेचेगा। जो बिलकुल अकेला है ,तन्हा है वो क्या बेचेगा ?वो दुसरो को भी तन्हाई ही देगा।
पहला कदम है की -सबसे पहले अपने आप को पाना है। सबसे पहले अपने अकेलेपन में खुश होना सीखना है और जब हम अकेलेपन में खुश होना सीख लेंगे तब दुसरो के साथ सम्बन्ध भी बड़े प्यारे बनेंगे। पहले अकेले में ही खुश होना सीखो। निर्भरता हटाओ दुसरो से। जो एकदम खाली है ,कुछ नहीं है करने को ,इधर तुमने फ़ोन मिलाया और वो भी इसी तलाश में था ,वो कहे की बस तेरे जैसे की जरूरत थी। पहले अकेले होना सीखो और फिर दुसरो से सम्बन्ध रखो।
इसका मतलब ये नहीं की सबसे सम्बन्ध काट लो। कहना बस ये है की सम्बन्ध का आधार बस उचित होना चाहिए।

1 comment:
बहुत अच्छा लिखा है व्यक्ति के पास जो होगा वह लोगों को वही दे सकता है।
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