ज़िंदगी जी किस आधार पर रहे हो?
जीवन में भी कोई विशेष कर्म पाप नहीं कहला सकता और कोई विशिष्ट कर्म पुण्य भी नहीं कहला सकता।
सही -गलत का ,अच्छे -बुरे का ,पाप -पुण्य का निर्धारण बस एक बात करती है की शिव से निकला है कर्म या नहीं निकला ,सच्चाई से निकला है या नहीं निकला।
सच्चाई से अगर नहीं उद्भूत होगा हमारा कर्म ,हमारा जीवन ,तो फिर वो कहा से संचालित हो रहा होगा ?
सच से नहीं चल रहा तो झूठ से चल रहा होगा।
तो झूठ माने क्या ? डर ,बेचैनी ,लोभ ,भय ,ईर्ष्या ,भ्रम।
यही देखना है।
यही सन्देश है नवरात्रि का की -ज़िंदगी जी किस आधार पर रहे हो ?
कर्म नहीं ,बाहरी बात नहीं ,रूप -रंग कलेवर नहीं ;मर्म ,आधार।
किस आधार पर जी रहे हो ?
शिव के आधार पर जी रहे हो या शव के आधार पर जी रहे हो ?
सत्य के आधार पर जी जी रहे हो या भ्रम और मोह और अँधेरे में ही जिए जा रहे हो ?
