किनसे संगती करे
सुसंगति मिल गयी ,तो सब कुछ मिल गया। और कुसंगति मिल गया तो जीवन तबाह है। क्युकी सारे रिश्ते है ही इसीलिए की कोई ऐसा मिल जाये जो तुम्हारा सच्चाई से रिश्ता बनवा दे।
जिससे भी मिल रहे हो अगर वो ऐसा है की तुमसे तुम्हारा ही परिचय करा दे ,तुमसे सच्चाई का परिचय करा दे ,तो सुसंगति है। इस व्यक्ति को जीवन में आदर देना ,जगह देना। मूल्य देना।
पर यदि जिससे मिल रहे हो उससे रूचि का सम्बन्ध है ,लेन -देन जैसी कोई बात है ,उसके साथ रहकर मजा आता है, ,अच्छा सा लगता है, उत्तेजना सी बढ़ती है ,थोड़ी खुमारी सी बढ़ती है ,तोडा नशा सा आता है ,तो समझ लेना ये तो आने जाने वाली चीज़े है ,लगी ही रहती है। इसमें सच्चाई वाली कोई बात नहीं।
अब ये देखना है और तय करना है की जिससे मिले हो ,उसका प्रभाव क्या हो रहा है हम पर।
असली रिश्ता ,सुसंगति ,वो है जो तुम्हे अपने तक न ले आये बल्कि तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हे सत्य तक ले जाये।
अधिकांश लोग तुमसे रिश्ता बनाते है क्युकी उन्हें तुमसे कुछ चाहिए। कोई ही होता है जिसे तुमसे ,या किसी और से ,कुछ नहीं चाहिए। वो तुम्हारा हाथ थम रहा है क्युकी तुम्हे मंजिल दिखाना चाहता है। यही रिश्ता रखने लायक है। इसी संगती से तुम्हारे भीतर के इस खालीपन का उपचार होगा।
