Thursday, August 26, 2021

कैसा संगति चाहते है आप

                                              किनसे संगती करे 

सुसंगति मिल गयी ,तो सब कुछ मिल गया। और कुसंगति मिल गया तो जीवन तबाह है। क्युकी सारे रिश्ते है ही इसीलिए की कोई ऐसा मिल जाये जो तुम्हारा सच्चाई से रिश्ता बनवा दे। 

जिससे भी मिल रहे हो अगर वो ऐसा है की तुमसे तुम्हारा ही परिचय करा दे ,तुमसे सच्चाई का परिचय करा दे ,तो सुसंगति है। इस व्यक्ति को जीवन में आदर देना ,जगह देना। मूल्य देना। 

पर यदि जिससे मिल रहे हो उससे रूचि का सम्बन्ध है ,लेन -देन जैसी कोई बात है ,उसके साथ रहकर मजा आता है, ,अच्छा सा लगता है, उत्तेजना सी बढ़ती है ,थोड़ी खुमारी सी बढ़ती है ,तोडा नशा सा आता है ,तो समझ लेना ये तो आने जाने वाली चीज़े है ,लगी ही रहती है। इसमें सच्चाई वाली कोई बात नहीं। 

अब ये देखना है और तय करना है की जिससे मिले हो ,उसका प्रभाव क्या हो रहा है हम पर। 

असली रिश्ता ,सुसंगति ,वो है जो तुम्हे अपने तक न ले आये बल्कि तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हे सत्य तक ले जाये। 

अधिकांश लोग तुमसे रिश्ता बनाते है क्युकी उन्हें तुमसे कुछ चाहिए। कोई ही होता है जिसे तुमसे ,या किसी और से ,कुछ नहीं चाहिए। वो तुम्हारा हाथ थम रहा है क्युकी तुम्हे मंजिल दिखाना चाहता है। यही रिश्ता रखने लायक है। इसी संगती से तुम्हारे भीतर के इस खालीपन का उपचार होगा। 


Wednesday, August 25, 2021

मन को कैसे बदले

http://jkverma1988.blogspt.com                                                     मन को कैसे बदले 

हम बड़े विचित्र  लोग है हम कृत्रिम प्रयास करते रहते है मन को ठीक करने के। हम कहते है मूड ख़राब है ,चलो घूमकर आते है !उदासी घेरे हुए है ,अकेलापन है ,चलो फ़ोन उठाकर किसी से बात कर लेते है। 

हम समझे नहीं !हम बहुत सतही निदान कर रहे है ,ये काम नहीं आएगा। थोड़ी देर के लिए भले हमें ये अहसास होता है की मन ठीक हो गया है ,लेकिन मन ठीक नहीं हुआ है। 

हम सब ने बड़े नकली इलाज पकड़ लिए है -

चलो तोडा टीवी देख लेते है ,कही घूम आते है !सफलता की कोशिशें कर लेते है !कई लोग मूड ठीक करने के लिए ये भी करते की -'' आओ खाये खूब सारा !'' औरते शॉपिंग पर निकल पड़ते है।  ज़िंदगी खराब जा रही है ,चलो शादी कर लेते है !

फिर हम कहते है  चलो बच्चा पैदा कर लेते है क्या पता इससे ठीक हो जाये। फिर कहते है अब एक घर खड़ा कर लेते है। ''

ये पागलपन है !कटाई पागलपन है !ये सारे नकली इलाज हम बस इसीलिए पकडे हुए है ताकि सच का सामना न करना पड़े। क्युकी सच डराता है। झूठो को ,नकली को ,अहंकार को  सच खूब डराता है और हमारा जीवन झूठो की एक लम्बी श्रृंखला बन जाता है , और कुछ जीवन में बचता ही नहीं है। 

मन में अगर कुछ गड़बड़ है ,बेचैनी महसूस होती है ,दुःख लगता है ,उलझन रहती है ,तो उसको समझो! इसी समझने का नाम है चेतना। इसी का नाम है होश। होश यही करता है ,वो मन को ही समझ जाता है और मन को समझा नहीं की मन बदल गया।  http://jkverma1988.blogspt.com      

Tuesday, August 24, 2021

बात समझ में आने के बाद भी जीवन क्यों नहीं बदलता ?

                      बात समझ में आने के बाद भी जीवन क्यों नहीं बदलता ?

 

उसकी वजह ये है की हमारे पास समझ तो होती है पर समझ के अलावा भी कोई चीज़ होती है -अतीत। 

ये जो अतीत है ये हमारी समझदारी को कर्म में ,जीवन में उतरने नहीं देता। अगर आपके पास सिर्फ समझदारी हो और अतीत न हो तो आज आप बड़े खुले ,मुक्त और निर्भीक तरीके से जियेंगे। 

पर हमारे पास तो है लेकिन साथ ही साथ अतीत की  याद ,आदतों का जोर ,मोह का बन्धन भी है। वो अतीत गायब नहीं होना चाहता ,वो अतीत अपने आप को गलत नहीं मानना चाहता ,वो अतीत अपने आपको मूल्यहीन नहीं मानना चाहता है ,वो अड़ के खड़ा रहना चाहता है। 

इस तरह अतीत समझ को दूषित कर देता। फिर आप समझते बुझते भी सही काम नहीं कर पाते 


Monday, August 23, 2021

AKELE CHALNE ME DAR KYU LAGTA HAI.

नीचे जो लाइन लिखी गयी ही उसे अन्य प्रेरणादायक विचार समझ के छोड़ न दे। ये आज की भागम भाग की ज़िंदगी और बस किसी चीज़ और इंसान में खुशी ,शान्ति  पाने की दौड़ में है है जो आज तक करोड़पति और अरबपति को भी स्थायी खुशी नहीं मिल पाया लेकिन यकीं करे इस लाइन के लिए आपके व्यस्त जीवन से समय निकालकर थोड़ा  गौर करे तो आपको कुछ न कुछ नया रास्ता मिलेगा।  

तुम्हारे मन में धारणाये हमेशा यही डाली गयी है। उदहारण के लिए  तुम्हे बचपन से बता दिया गया की मनुष्य एक सामाजिक पशु है। 
अब दो तरफा तुम पर चोट की गयी है। 
पहले तो तुम्हे बोला गया की तुम पशु हो। पशु शब्द आता है उसी धातु से जहाँ से पाश आता है -पाश माने बन्धन। तो पहली बात तो ये की तुम्हे बोल दिया गया है की बंधे रहना तुम्हारा स्वाभाव है। शारीरिक रूप से तुम्हे पशु घोषित कर दिया गया की तुम सामाजिक हो। तुम सामाजिक नहीं हो ही नहीं ;न तुम सामाजिक हो ,न तुम शारीरिक हो। 
पर तुम्हे बार बार पट्टी यही पढाई गयी है तो मन इतनी बुरी तरह इन सब बातो से दब गया है की जैसे हीरा हो ,हुए उसके ऊपर टनो राख डाल दी जाए तो हीरा कही दिखाई न पड़े ,कही प्रकट न हो। ऐसी तुम्हारी हालत हो गयी है। 
हीरे तो हम सभी है ,इसमें कई शक नहीं है ,पर राख हमारे ऊपर टनो पड़ी है। वो राख ही हमारा बोझ है ,उसी से मुक्त होना है। कुछ पाना नहीं है ,बस मुक्त होना है उसी से। 
इसीलिए पाने की कोशिश छोडो ,जो पहले ही इकठ्ठा कर रखा है ,बस उसी को साफ़ करो। पाने की सारी कोशिश खराब है। लेकिन हम पड़े रहते है 'कुछ पाने की फेर में 'हम कहते है ''अभी कुछ और पाना है''। अभी पा पाकर तृप्त नहीं हुए ?पा पाकर ये हमारी गत बन गयी है। अभी पूरी नहीं पड़ रही ?पाना छोडो !अब हमारा समय है हल्का होने का। पाने का अर्थ है और बोझ इकठ्ठा करना। ये साड़ी बाते की-''दूसरे आवश्यक है '', ''बैसाखिया चाहिए'', ''कोई दूसरा रास्ता दिखायेगा , ''मार्गदर्शक हो कोई '' अरे अपना कोई रास्ता होता है !कोई हो जो रोशनी डाले ,कोई हो जो बताये की जीवन क्या होता है। ये सारी बाते बस धारणाये है। हमें अधूरा नहीं बनाया गया है कोई भी अधूरा नहीं बनाया गया है सब अपने आप में सम्पूर्ण है। 
सम्बन्ध होने चाहिए कोई शक नहीं है ,रिश्ते होने चाहिए ,पर वो रिश्ते अपूर्णता के नहीं होते। मै अधूरा हु ,तुम भी अधूरे हो ,चलो मिलकर पुरे हो जाये - इससे कोई पुरापन नहीं आता। 
तुम भी पुरे हो, वो भी पुरे है और इसी पूरेपन में रिश्ता बनता है असली। इस पूरेपन मे ही असली रिश्ता बनता है। 















Saturday, August 21, 2021

Rakshabandhen Bhai special

क्या बोध, समझदारी और गहराई के बिना आपकी बहन जीवन मे आगे बढ़ पायेगी?
भाई होने के नाते क्या आपका पहला कर्तव्य बहन का आत्मिक उत्थान नही हैं:
अगर स्त्री का मन सुलझा हुआ नही है, उलझा हुआ है तो क्या सच्ची आत्मिक खुशी किसमे है कभी जान पायेंगे:
यदि हम एक भाई है तो हमारा पहला कर्तव्य उन्हे सशक्त बनाना है .
आत्मिक उत्थान या सच्ची या स्थायी खुशी मन को जो संस्कार मिला है उसे झुठा मानकर अपने आत्मिक स्वरूप मे आना.

रक्षाबन्धन को ऊँचे अर्थ दें '

                 रक्षाबन्धन को ऊँचे अर्थ दें '
 
अब समय आ गया है कि स्त्री रक्षा मांगे नहीं ,रक्षा प्रदान करे। 
जो स्वयं शक्तिरूपा है ,वो कब तक दुसरो से रक्षा मांगती रहेगी ?
       
       आज पृथ्वी संकट में है ,पशु पंक्षी संकट में है ,
       मानव संकट में है,और सत्य संकट में है है। 

      पुरुष के साथ -साथ स्त्री का भी दायित्व है कि 
इस रक्षाबन्धन पर संकल्प ले हारती हुयी सच्चाई की रक्षा करने का। 

 NEVER SURRENDER FREEDOM

SURRENDER IN FREEDOM

ज़िंदगी जी किस आधार पर रहे हो?

ज़िंदगी जी  किस आधार पर रहे हो? जीवन में भी कोई विशेष कर्म पाप नहीं कहला सकता और कोई विशिष्ट कर्म पुण्य भी नहीं कहला सकता।  सही -गलत का ,अच्छ...