कबीर के दोहों में छिपा जीवन का राज
1_ अपने को परखो दूसरों को नहीं
ये दोहा कहता है कि जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। पर जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है। यानि हमें जजमेंटल नहीं बनना सेल्फ एनेलेटिकल बनना है।
2_बात के अर्थ को ग्रहण करें
इस दोहे में कहा गया है कि सज्जन को ऐसा होना चाहिए जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक तत्व को बचा लेता है और निरर्थक को भूसे के रूप में उड़ा देता है। यानि ज्ञीनी वही है जो बात के महत्व को समझे उसके आगे पीछे के विशेषणों से प्रभावित ना हो।
3_कोई भी इंसान छोटा नहीं होता
इस दोहे के अनुसार एक छोटे से तिनके को भी कभी बेकार ना कहो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब होता है, क्योंकि यदि कभी वह उड़कर आँख में आ गिरे तो गहरी पीड़ा देता है। यानि कबीर ने स्पष्ट बताया है कि छोटे बड़े के फेर में ना पड़ें और सभी इंसानों को उनके जाति और कर्म से ऊपर उठ कर सम्मान की दृष्टि से देखें।
4_संतोषी परम सुखी
कबीर जी कहते हैं इस जीवन में जिस किसी भी व्यक्ति के मन में लोभ नहीं, मोह माया नहीं, जिसको कुछ भी खोने का डर नहीं, जिसका मन जीवन के भोग विलास से बेपरवाह हो वही सही मायने में इस राजा है। मतलब लालच करने वाला कभी ना सुखी होता है ना संतुष्ट और नाही कामयाब।
5_जीवन का मर्म समझें
मिटटी मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार से कहती है, तू क्या मुझे मसलेगा, एक ऐसा दिन आयेगा जब मैं तुम्हें मसल दूंगी। यह बात बहुत ही ध्यान से समझने की है। जीवन में चाहे इंसान कितना बड़ा आदमी बन जाये अंत में उसे खाक हो कर या दफ्न हो कर मिटटी में ही मिल जाना है।, इसलिए घमंड कभी ना करें।
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2 comments:
Bahut hi Sundar tarike se samjhane ki koshish bahut hi achcha Laga
Nice massage..
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