क्या करे इस गिरते हुए समाज में ?स्वयं न गिर जाए !
समाज या दुनिया क्या है ?हम है ,आप है। जैसे हम है ,आप है ,वैसा ही संसार है।
अगर आप समाज को और संसार को गिरता हुआ पाते है ,तो उसका कारन यही है की इंसान गिर रहा है ,हम और आप गिर रहे है।
ऐसा तो नहीं हो सकता की इंसान उठा हुआ रहे ,और समाज पतित रहे। और जब समाज गिर रहा होता है ,तो उसका अपना एक वेग होता है। गिरता हुआ समाज औरो को और गिराता है,अपने साथ गिराता है।
गिरते हुए समाज के मध्य में अगर आप बैठे हो तो आपका धर्म है की अपने आसपास गिरती हुयी चीज़ो ,इंसानो ,और व्यस्थाओं के साथ आप स्वयं भी न गिर जाये।
यही धर्म है आपका।
''क्या करे इस गिरते हुए संसार में ?''
स्वयं न गिर जाये।
जैसे गिरते हुए का वेग होता है।,एक कर्षण होता है की वो औरो को भी अपने साथ नीचे खींच लेना चाहते है ,गिरा लेना चाहते है ,ठीक उसी तरह से न गिरने का भी अपना एक कर्षण होता है ,उसका अपना भी एक महत्त्व होता है। जैसे समझ लीजिये की गिरना संक्रामक होता है ,ना गिरना भी संक्रामक होता है। दस लोग मुर्खताये कर रहे है ,तो ग्यारवे पर भी प्रभाव पड़ता है ,पर ग्यारवा अडिग रहे और अपने आप को प्रभावित न होने दे ,तो इस ग्यारवे का बाकी दस पर भी प्रभाव पड़ता है।
यही धर्म है आपका की जब दस लोग मूर्खता कर रहे है तो आप मूर्खता न करे। आप मूर्खता न करे तो वो दस की सुधरने की सम्भावना बढ़ जाती है। https://jkverma1988.blogspot.com

1 comment:
Bahut khud bat Kahi hai..
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