आत्मसम्मान की परिभाषा
पहली बात ये की हमे आत्मसम्मान की गलत परिभाषा आज तक जो हमारे परिवेश से मिला है वो गलत है ,हम ये सोचते है की कोई कुछ बुरा बोल दिए या कोई हमारे अवहेलना कर दिए तो हम बोलते है की हमारे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा बल्कि ये आत्मसम्मान नहीं गुलामी है जो लोगो के हिसाब से हमारा सम्मान निर्भर करता है। आत्मसम्मान यह है की कोई कुछ भी बोले हम अपनी सम्मान के लिए शांत ,स्थिर रहेंगे और खुद को सम्मान देंगे ये आत्मसम्मान होगा। हां कभी कभी जरूरी होता है की सामने वाले को जो आपके शांत रहने के बावजूद आपका विरोध कर रहे तो उसके गलती के अहसास के लिए कुछ करना जरूरी होता है। वास्तव में हमें किसी से कोई उम्मीद होती है की सामने वाले से जो मन के अनुसार न हो तो लगता है हमारा सम्मान न हुआ और दुखी होते है। दूसरी तरफ हमें बचपन से ख़ुशी या सम्मान दूसरे चीज़ो से. दूसरे लोगो से मिलता है ये सिखाया गया है इसीलिए हमेशा हमारा ख़ुशी ,सम्मान दुसरो पर निर्भर है और जो कभी हमारे उम्मीद के हिसाब से नहीं मिलता और हम हमेशा असंतुष्ट रहते है और दुखी रहते है। हमारी खुद की निजता नहीं है। मन हमेशा अपूर्ण महसूस करता है और लोगो ,चीज़ो से पूर्ण होने का प्रयास करता है जो संभव नहीं है। भले कुछ देर के लिए अस्थायी ख़ुशी लोगो,चीज़ो से मिल सकती है।हम अपने प्रति ईमानदार रहे और सहज ,सरल रहे। https://jkverma1988.blogspot.com

2 comments:
Right..msg
बहुत सुंदर
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