स्वयं का निरिक्षण
जब कोई अपने दुःख की सही दिशा में और समझदारी के साथ खोज करता है तो वह दुःख में दुखी नहीं बल्कि खुश होता है। अतः पहले खुद को दुःख देना बंद करो ,फिर दूसरे से उम्मीद रखे की वो आपको दुःख न दे। खोज के पहले उस इंसान को यह बिलकुल दिखाई ही नहीं देता की वह रोज अपने विचारो द्वारा खुद को पीड़ित कर रहा है। फिर समझ मिलने के बाद वह कहता है -अरे ,इस ढंग से मैंने कभी सोचा नहीं था ,मई भी कितना मुर्ख हु ,हर बार उसी घटना घटना को याद कर-करके खुद को ही दुःख दे रहा हु।
हालांकि हमारा जो परिवेश है और जिस ढंग से हमने बचपन से हमारे परिवेश की बाते संस्कार के रूप में मन में बसा लिए है तो जल्दी स्वीकार करना मुश्किल होता है की हमारे दुःख का कारन हम खुद है लेकिन सच यही है की हम अपने विचारो ,उम्मीदों के कारन ही हम तकलीफ में होते है
1 comment:
Choti lekin badi bat....
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